श्रीमाली ब्राह्मणों की सन्त परम्परा

परम्परागत रूप से श्रीमाली ब्राह्मण भगवान शंकर के उपासक रहे हैं। अपने आराध्य देव शिव की पूजा एवं आराधना सबंधी विविध धार्मिक विधियों के वे न केवल शास्त्रोक्त पंडित बल्कि रचनाकार भी रहे हैं। शंकर के अवतार माने जाने वाले आद्य जगद्गुरू शंकराचार्य (684 ई. से 716 ई.) ने प्राचीन सनातन धर्म को जो पुर्नजीवन एवं पुर्नप्रतिष्ठा प्रदान की, श्रीमाली ब्राह्मण समाज सच्चे अर्थों में उसका संवाहक बना। श्रीमाली ब्राह्मण समाज में समय समय पर ऐसे सन्त महापुरूष हुये जिन्होंने शंकराचार्य के बताये रास्ते पर चलते हुये त्याग व तपस्या के बल पर सम्पूर्ण समाज पर कालजयी प्रभाव डाला। ऐसे सन्त महापुरूषों के सिरमौर श्रीमाली ब्राह्मणों के प्रातः स्मरणीय गुरू श्री फूलनारायण थे, जिनकी परम पावन तपोभूमि श्री फूलनारायण आश्रम, सोजत, समस्त श्रीमाली ब्राह्मण समाज के गुरूद्वारे के रूप में ख्यातिप्राप्त है।

श्री फूलनारायण आश्रम सोजत

foolnaravan_ashramवर्तमान में सोजत में सूखड़ी नदी के किनारे जहां श्री फूलनारायण आश्रम है, वहां आज से लगभग दो सौ वर्ष पूर्व बड़ाबास सोजत सिटी के ही श्रीमाली ब्राह्मण माहुडा श्री नारायणलाल द्विवेदी ने तपश्चर्या की थी। इस स्थान की सुरम्यता एवं पवित्रता को तपश्चर्या के अनुकूल जानकर उन्होंने ही सर्वप्रथम यहां पर एक कुटी बनाई थी। वैराग्य की ओर बढ़ते हुये श्री नारायण ने कार्तिक शुक्ला 10 वि. सं. 1851 को सन्यास धारण कर इस कुटी को अपने आश्रम श्री नारायण आश्रम के रूप में स्थापित किया। बाद में जोधपुर के महाराजा तख्तसिंहजी ने स्वामी नारायण को उनके आश्रम के लिये यह सारी जमीन (38 बीघा एवं 11 बिस्वा) उन्हें डोहली के रूप में भेंट कर दी। इस प्रकार वर्तमान श्री फूलनारायण आश्रम की स्थापना वि.सं. 1851 में स्वामी नारायण के द्वारा हुई,यद्यपि इसका वर्तमान स्वरूप मुख्यतः स्वामी श्री फूलनारायण की ही देन है। स्वामी श्री नारायण वि.सं. 1897 में इसी आश्रम में समाधिस्थ हुए थे।

 

श्री फूलनारायण स्वामी

foolnarayanश्री नारायण स्वामी के अनन्य एवं महान् शिष्य श्री फूलनारायण हुए जो वस्तुतः नारायण परम्परा को उच्च शिखर पर ले गए। श्री फूलनारायण स्वामी का बचपन का नाम फूलचन्द था जो सोजत के निकट ही ग्राम लुण्डावास के निवासी श्रीमाली ब्राह्मण पं. दीपचन्दजी व्यास के सुपुत्र थे। गृहस्थ जीवन में प्रवेश के बावजूद वे अपने भक्तिभाव एवं वैराग्य को छुपा न पाए और शीघ्र ही वे श्री नारायण के सम्पर्क में आ गए। इनकी भक्ति और वैराग्य की प्रबलता देखकर श्री नारायण स्वामी ने आषाढ़ शुक्ला 3 वि.सं. 1864 को इन्हें मंत्रोपदेश एवं संन्यास दीक्षा प्रदान कर इन्हें अपना शिष्य बनाया और इनका नाम श्री फूलनारायण रख दिया। श्री नारायण स्वामी ने श्री फूलनारायण को वागेलाव तालाब पर, वर्तमान में जहाँ सुरेश्वर महादेव का मन्दिर है, तपश्चर्या करने का आदेश दिया। अगले बीस वर्षो तक श्री फूलनारायण ने वागेलाव पर कठिन तप करते हुए अनेक आध्यात्मिक शक्तियाँ अर्जित की। वागेलाव पर रहते हुए भी श्री फूलनारायण ‘नारायण आश्रम’ जाकर अपने गुरू की सेवा में सदैव तत्पर रहते थे। यही कारण था कि श्री नारायण ने अपने जीवनकाल में ही श्री फूलनारायण को अपना गादीधारी नियुक्त कर दिया था। वि.सं. 1897 में अपने गुरू श्री नारायण स्वामी के समाधिस्त होने के समय श्री फूलनारायण उनके पास में थे और गुरू की इच्छानुसार ही उन्होंने तत्काल गद्दी सम्भाल ली थी।

वि.सं. 1897 में श्री फूलनारायण स्वामी के गादीधारी होते ही नारायण आश्रम का विकास तेजी से होने लगा और उनकी दिव्य आध्यात्मिक ख्याति दूर दूर तक फैलने लगी। वि.सं. 1898 में किशनगढ़ निवासी पं. बछराज व्यास की सुुपुत्री जमना बाई (जिसका विवाह जोधपुर निवासी पं. काशीराम जोशी के साथ हुआ था ; किन्तु बाल विधवा हो गई थी) ने यहँा आकर वैराग्य धारण करके स्वामी श्री फूलनारायण का शिष्यत्व ग्रहण किया। आश्रम में रहते हुए जमना बाई ने स्वामीजी की सेवा एवं तपश्चर्या में अपना सम्पूर्ण जीवन अर्पित कर दिया था। वि.सं. 1905 में श्री फूलनारायण ने इस आश्रम में बावड़ी खुदाकर उसका भव्य प्रतिष्ठा समारोह आयोजित किया तभी से यह आश्रम उनके नाम पर ’फूलनारायण आश्रम’ के नाम से प्रसिद्धि को प्राप्त हुआ। स्वामीजी की ख्याति सुनकर जोधपुर महाराज श्री तख्तसिंह सपरिवार माघ शुक्ला 5 वि.सं. 1909 में उनके दर्शनार्थ आश्रम में पधारे थे। तख्तसिंहजी स्वामी श्री फूलनारायण से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंनेश्री नारायण स्वामी को आश्रम हेतु भेंट की गई डोहली की जमीन को पुनःस्वामी फूलनारायण के नाम अनुमोदित कर उसे विधिवत् रिकार्ड में लाने के माफियात कमेटी को आदेश दिए। इसके फलस्वरूप माफियात कमेटी ने श्री फूलनारायण आश्रम एवं उससे संबंधित सवा तेतीस बीघा जमीन को (जमाबन्दी 747 खसरा नं. 427) तथा सुरेश्वर महादेव एवं उससे संबंधित सवा छह बीघा जमीन को (जमाबन्दी 1311 खसरा नं. 1) महन्त श्री फूलनारायण के नाम डोहली की जमीन के रूप में विधिवत् इन्द्राज कर ली थी। केवल इतना ही नहीं, महाराजा तख्तसिंहजी ने श्री फूलनारायण स्वामी द्वारा आश्रम में चलाए जा रहे अन्नक्षेत्र की सहायतार्थ 60 रू. मासिक देने के आदेश भी कर दिए। तख्तसिंहजी के स्वर्गवास के पश्चात् यह राशि 50 रू. मासिक हो गई थी और यशवन्तसिंहजी के शासनकाल में वि.सं. 1949 में यह राशि भी बन्द कर दी गई।

वागेलाव पर रहते समय वर्तमान सुरेश्वर महादेव स्थान पर वि.सं. 1892 में स्वामी श्री फूलनारायणजी ने ही कुआँ खुदवाया था और वि.सं. 1903 में यहाँ निवास हेतु धर्मशाला का निर्माण करवाया था। वि.सं. 1914 में स्वामीजी ने यहाँ शिवलिंग एवं नन्दिकेश्वर की स्थापना कर इस स्थान की सुरेश्वर महादेव का मंदिर नाम प्रदान किया। इसी प्रकार आश्रम की भूमि का विधिवत् अधिग्रहण होने के पश्चात् अी फूलनारायण ने इसके चारों ओर परकोटा बनावाया। मुख्य प्रवेशद्धार ’पोल‘ तथा पोल के अन्दर के कमरे भी उन्होंने बनवाए। बावड़ी को भी पक्का करवाया गया। इस व्यवस्थित नवनिर्माण के फलस्वरूप एक साधारण नारायण कुटीर या नारायण आश्रम ने एक विशाल एवं भव्य श्री फूलनारायण आश्रम का स्वरूप धारण कर लिया। लगभग 55 वर्ष तक संन्यस्त जीवनयापन करने के बाद कार्तिक शुक्ला 14 वि.सं. 1919 में दण्डी स्वामी श्री फूलनारायण ने अरूणोदय के समय आश्रम में जीवित समाधि ली थी। स्वामी जी के पीछे जमनाबाई ने षट्दर्शन भोज किया था। अगले पन्द्रह वर्ष तक जमनाबाई ने अपने गुरू की इच्छानुसार उनकी बनाई गई व्यवस्था के अनुरूप श्री फूलनारायण आश्रम का कुशलतापूर्वक संचालन करके स्थानीय प्रजा का मन मोह लिया था। एक दीर्घ भक्ति एवं वैराग्यपूर्ण जीवन यापन करने के पश्चात् वैशाख कृष्णा 5 वि.स.ं 1934 को जमनाबाई भी इसी आश्रम में समाधिस्थ हो गई थी।

श्री फूलनारायण स्वामी के गादीधारी श्री मुकनारायण हुए थे। जोधपुर निवासी (चूना की चैकी) श्रीमाली ब्राह्मण पं. कृष्णरामजी के पुत्र मुकनलाल त्रिवेदी वैरागी प्रकृति के व्यक्ति थे और श्री फूलनारायण आश्रम सोजत में उनका आना जाना बराबर रहता था। कहा जाता है कि एक बार गुरू श्री फूलनारायण ने स्वप्नदर्शन में इनको अपने आश्रम में पहुँच कर शिष्यत्व प्राप्त करने की प्रेरणा दी । इसी स्वप्नदर्शन के आधार पर पर श्री मुकनलालजी आषाढ़ शुक्ला 13 वि.सं. 1936 को श्री फूलनारायण आश्रम सोजत में पधारे। इस समय सोजत तथा आसपास के समस्त श्रीमाली ब्राह्मणों (न्यात) की सहमति एवं उपस्थिति में आषाढ़ शुक्ला 15 गुरू पूर्णिमा (वि.सं. 1936) के दिन श्री मुकनलालजी ने एक विशिष्ट परम्परा का पालन करते हुए संन्यास दीक्षा ली और श्री फूलनारायण स्वामी की पादुका धारण कर उनके गादीधारी बने। इस समय से वे श्री मुकननारायण स्वामी के नाम से प्रसिद्ध हुए। आषाढ़ी पूर्णिमा वि.सं. 1963 को प्रातः आश्रम में ही वे समाधिस्थ हुए।

श्री ब्रह्मनारायण स्वामी

bharamnarayanश्री नारायण, श्री फूलनारायण एवं श्री मुकननारायण के पश्चात् इस परम्परा के चैधे गादीधारी श्री ब्रह्मनारायण स्वामी हुए थे। इनका बचपन का नाम लादूराम था और जन्म मार्गशीर्ष शुक्ला 2 वि.सं. 1939 में जोधपुर निवासी श्रीमाली ब्राह्मण पं. देवीदान अवस्थी के घर पर हुआ था। बड़े होने पर अपने पैतृक व्यवसाय के कारण ये कलकत्ता में रहने लगे थे। व्यावसायिक बन्धनों के बावजूद वे एकान्तिक एवं वैरागी प्रवृत्तियों में लीन रहते थे। इनके बारे में भी यह कहा जाता है कि वि.सं. 1964 श्रावण मास में गुरू महाराज ने इन्हें स्वप्नदर्शन द्वारा श्री फूलनारायण आश्रम सोजत की गादी धारण करने की प्रेरणा दी थी। इस स्वप्नदर्शन ने लादूराम को परम वैराग्य की ओर अग्रसर कर दिया और वे आश्विन मास में कलकत्ता से सोजत के लिए रवाना हो गए। प्रथम जोधपुर पहुंचकर लादूराम ने अपने कुटुम्बियों की स्वीकृति प्राप्त की। फिर सन्यास धारण करने हेतु सोजत पहुंच गए। सोजत एवं आसपास के समस्त श्रीमाली ब्राह्मणों (न्यात) की सहमति प्राप्त हो जाने पर विशिष्ट परम्परानुसार लादूराम ने स्वामी नित्यानन्द से कार्तिक शुक्ला 15 वि.सं. 1964 में संन्यास दीक्षा ली। विजयादि हवन, अष्टश्राद्ध से निवृत्त होकर प्रेषोच्चार उपदेश लिया और गुरू महाराज श्री फूलनारायण स्वामी की चरण पादुका धारण कर श्री ब्रह्मनारायण स्वामी के नाम से उनके गादीधारी बने। इस अवसर पर स्वामीजी की ओर से स्थानीय न्यात (श्रीमाली ब्राह्मण) को ब्रह्मभोज कराया गया और न्यात की तरफ से उन्हें चादर ओढ़ाई गई।

श्री ब्रह्मनारायण स्वामी ने शीघ्र ही अपनी विद्वता एवं प्रभावशाली व्यक्तित्व के बल पर श्री फूलनारायण स्वामी की तरह न्याति एवं न्याति के बाहर, अभूतपूर्व लोकप्रियता प्राप्त कर ली। अपने इसी प्र्रभाव का उपयोग करते हुए उन्होंने न केवल श्री फूलनारायण आश्रम की भौतिक समृद्धि में वृद्धि की बल्कि उसे आध्यात्मिक गौरब भी प्रदान किया। श्री ब्रह्मनारायण ने परम्परागत आश्रम की जमीन (38 बीघा एवं 11 विस्वा) अपने नाम 5 मई 1923 ई. के माफियात कमेटी जोधपुर दरबार के आदेश से करवाई। भेंट में प्राप्त एवं चन्दा-राशि द्वारा स्वामीजी ने श्री फूलानारायण आश्रम का जीर्णोद्वार करवाया। आश्रम में महादेवजी का मंदिर बनवाया तथा उसमें शंकराचार्य जी की मूर्ति स्थापित की एवं तप व साधना के लिए एक गुफा बनाई। वि.सं. 1973 में पोल (मुख्य प्रवेश द्वार) के ऊपर के कमरों का निर्माण करवाया, बुर्ज के अन्दर भी कमरा, शौचालय, स्नानागार इत्यादि बनवाए। सुरेश्वर महादेव में भी एक कुटीर का निर्माण करवाया गया। स्वामीजी के एक भक्त व्यास छैलाराम (पुत्र किशनदास पुष्करणा ब्राह्मण) ने सोजत में ही जोधपुरिया दरवाजे के बाहर स्थिति बगीची (ज्ञानानन्दजी की बगीची) 25 जनवरी, 1925 को भेंट कर दी जिसकी रजिस्ट्री जोधपुर दरबार में (पट्टा नं. 6/31-32 मिसल 11/ 27-28) 16 जुलाई 1930 ई. को की गई। स्वामीजी ने 1925 ई. से लेकर 1939 ई. के बीच चार हजार रूपये खर्च कर, इस बगीची में नवनिर्माण करवाकर इसे वर्तमान स्वरूप दिया था। इस बगीची में स्वामीजी ने गरीबों को निःशुल्क चिकित्सा प्रदान करने हेतु पुण्यार्थ एक औषधालय शुरू किया था। इसी प्रकार श्री ब्रह्मनारायण ने पुस्तकों का एक विशाल भण्डार संगृहीत कर श्री फूलनारायण आश्रम में ‘सरस्वती-भण्डार’ नामक एक पुस्तकालय की स्थापना की थी।

श्री ब्रह्मनारायण का प्रभाव विस्तार

श्री फूलनारायण की शिष्य परम्परा में श्री ब्रह्मनारायण एक महान् व्यक्तित्व के धनी थे, जिनके गादीधारी होने से गुरू श्री फूलनारायण एवं उनकी तपोभूमि का गौरव बढ़ा और उनके प्रभाव का विस्तार भारत के अनेक क्षेत्रों में हुआ। स्वामी श्री फूलनारायण का प्रभाव प्रभुख रूप से मारवाड़ तक ही सीमित रहा था, किन्तु स्वामी श्री ब्रह्मनारायण ने अपनी विद्वता एवं देशाटन द्वारा भारत के विभिन्न भागों में अपने प्रभाव का विस्तार किया। संक्षेप में श्री फूलनारायण को तपस्वी संन्यासी तथा श्री ब्रह्मनारायण को विद्वान् संन्यासी के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।

जिस प्रकार सोजत में रहते हुए श्री ब्रह्मनारायण ने श्री फूलनारायण आश्रम, सुरेश्वर महादेव तथा ज्ञानानन्दजी की बगीची में जीर्णोद्धार एवं नवनिर्माण का कार्य करवाया, उसी प्रकार सोजत से बाहर भी उन्होने अपने प्रभाव का उपयोग करते हुये नवीन मठों की स्थापना का महत्वपूर्ण कार्य किया। अधिकांश लोगों की मान्यता है कि श्री ब्रह्मनारायण ने सोजत के बाहर पुष्कर, जोधपुर, रतलाम व काशी में चार मठ स्थापित किये थे। किन्तु स्वयं स्वामीजी के लिये प्रामाणिक दस्तावेजों से पता चलता है कि उन्होने सिर्फ पुष्कर एवं जोधपुर में ही अपने मठ स्थापित किये थे। जोधपुर में चांदपोल दरवाजे के बाहर घाटे पर कायस्थ शिवनारायण के पुत्र रामेश्वरनारायण के मकान को रू 755/- में 30.10.1936 में खरीदकर (पट्टा न. 222 मिसल नं. 470/ 36 – 37 जोधपुर गवर्नमेंट में रजिस्ट्री 11 अप्रेल 1938 ई.) वहां अपना मठ ; (श्री ब्रह्मनारायण मठ, जोधपुर) स्थापित किया था। आसोज सुद 15 वि. सं. 1993 में स्वामीजी ने इस मठ की स्थापना की थी और वैशाख सुद 15 वि. सं. 1995 में इसमें श्री शकराचार्य जी की मूर्ति स्थापित की गई थी। रतलाम में संभवतः वहां के श्रीमाली ब्राह्मण समाज द्वारा स्थापित मठ में उनको विराजमान कर सम्मानित किया गया था। स्वामीजी के लिखे एक पत्र 9.4.31 से पता चलता हैं कि उस समय उनके काशी प्रवास के समय उनके साथ दण्डी स्वामी हरिहरानन्द सरस्वती (देसूरी निवासी श्रीमाली ब्राह्मण के रूप में उल्लिखित) थे । सम्भवतः इन्ही के काशी स्थित आवास को मठ के रूप में माना गया है। वस्तुतः स्वयं स्वामी जी द्वारा काशी व रतलाम में किसी मठ की स्थापना का कोई प्रामाणिक विवरण नहीं मिलता है।

श्री ब्रह्मनारायण आश्रम (मठ) पुष्कर की स्थापना

इस आश्रम की स्थापना श्री फूलनारायण आश्रम सोजत के मठाधीश दण्डी स्वामी श्री ब्रह्मनारायणानन्द सरस्वती ने बड़ी बस्ती पुष्कर में श्री महालक्ष्मी मंदिर के निकट सोमवार फाल्गुन शुक्ला 8 वि. सं. 1995 तदनुसार 27 फरवरी 1939 ई. को की थी। स्वामीजी ने इस मठ की जमीन दो भागों में दो अलग-अलग व्यक्तियों से खरीदकर मठ निर्माण हेतु उसे संयुक्त रूप दे दिया था –

1. मुख्य हिस्सा (नीम एवं शिव मंदिर वाला) – इसे अजमेर निवासी शेषकरण के पुत्र सिद्धकरण सरावगी से दो सौ रूपये में खरीदकर 27.2.39 ई. में अजमेर में रजिस्ट्री (संख्या 3031) कराई थी।

2. रसोईघर वाला हिस्सा – इसे स्वामीजी ने पुष्कर निवासी रिद्धकरण महाजन के पुत्र गुलाबचन्द रांका से चार सौ पचास रूपये में खरीदकर 23 जून 1939 ई. में अजमेर से रजिस्ट्री (रजिस्ट्री सं. 616) कराई थी।

3. समाधि की जमीन – स्वामीजी ने अपने समाधिस्थल के लिये मठ के निकट ही जमीन खरीदी थी। यह जमीन पुष्कर निवासी ब्राह्मण अम्बालाल धर्मावत के पुत्र जयनारायण से रू. 125/- में खरीदकर 29 फरवरी 1940 ई. को अजमेर में रजिस्ट्री (रजिस्ट्री सं. 2288) कराई थी।

श्री ब्रह्मनारायण आश्रम पुष्कर की स्थापना में स्वामीजी को जमीन की खरीद से लेकर भवन निर्माण के विभिन्न चरणों में बिना किसी संकीर्ण या क्षेत्रीय मनोवृति के समस्त श्रीमाली ब्राह्मणों का सहर्ष दान एवं सहयोग प्राप्त हुआ जिसका प्रमाणिक उल्लेख इस मठ में यथास्थान शिलालेखों के रूप में अंकित है। मठ के दूसरे हिस्से (रसोईघर वाले) की जमीन खरीद एवं उसमें भवन निर्माण के लिये 1500/- रू. खर्च करके बाली निवासी श्रीमाली ब्राह्मण धनेश्वर बोहरा की पुत्री प्यारी देवी (देव गौधा जयशंकर की पत्नी) ने अपनी माता पार्वती देवी के स्मरार्णाथ का. सु. 11 वि. सं. 1996 (23.6.39) को इसे स्वामी जी को अपर्ण किया था। इसी हिस्से में मठ के प्रवेश द्वार से सामने ही का. सु. 15 वि. सं. 1997 में स्वामीजी ने शंकराचार्य का मंदिर स्थापित किया था और उनके लिय मूर्तियाँ भी मंगवा ली थी ; किन्तु इसकी प्रतिष्ठा का कार्य उनके स्वर्गवास के पश्चात वैशाख शुक्ला 9 से 13 वि. सं. 2000 में श्री कृष्णानन्दजी द्वारा सम्पन्न हुआ था। श्री शंकराचार्यजी के इस मंदिर के जीर्णोद्धार का कार्य कागमाल निवासी दुर्गाशंकर मगनीराम दवे ने का. सु. 15 वि. सं. 2033 (6.11.76) में किया था। मठ के मुख्य हिस्से के उपरी भाग में एक कमरा (संख्या 12) खोंड निवासी रघुनाथ जी के पुत्र बोहरा गौरीशंकर ने आषाढ़ शुक्ला 2 वि. सं. 1996 में बनाया था तथा उसके पास वाला कमरा (संख्या 11) गौरीशंकर की बहन शिवप्यारी (जोधपुर निवासी दवे मनावत मूलचन्दजी की पत्नी) ने चैत्र कृष्ण अमावस्या वि. सं. 1996 (7.4.40) में बनाया था। अन्य कमरों के निर्माण का कोई प्रामाणिक उल्लेख नहीं मिलता हैं, किन्तु मठ का अधिकतर निर्माण कार्य, जो वर्तमान में दिखाई देता है स्वयं स्वामी पं. ब्रह्मनारायण के द्वारा अपने जीवन काल में ही पूरा कर लिया गया था। मठ में नल कनेक्शन तथा ‘शिवालय’ में (प्राचीन खण्डित मूर्तियों को हटाकर) गणपति, पार्वती एवं कार्तिकेय की नवीन मूर्तियों की स्थापना का कार्य जोधपुर निवासी श्रीमती मूलीबाई (पत्नी स्व. मंशारामजी) ने 16.11.86 को सम्पन्न किया था। वर्तमान में तीन आधुनिक शौचालय सहित मठ की मरम्मत एवं जीर्णोंद्धार का कार्य अखिल भारतवर्षीय श्रीमाली ब्राह्मण समाज संस्था पुष्कर द्वारा किया जा रहा है।

स्वामीजी द्वारा अन्नक्षेत्र का प्रारम्भ

श्री ब्रह्मनारायण स्वामी ने मठ की स्थापना के शीघ्र बाद ही इसकी प्रतिष्ठा के साथ ही इस तीर्थस्थली में दण्डी स्वामियों के पुण्यार्थ अन्नक्षेत्र प्रारम्भ करने की योजना बनाई थी। इस योजना के अनुसार वि. सं. 1996 में आषाढ़ शुक्ला 7, 8 व 9 को तीन दिवसीय भव्य प्रतिष्ठा का कार्य सम्पन्न किया गया और आषाढ़ शुक्ला दशमी (26 जून 1939) से ही इस मठ में अन्नक्षेत्र शुरू हो गया। इन वर्षों में विशेषकर चातुर्मास के समय पं. ब्रह्मनारायण स्वामी के अधिकतर शिष्य यथा ज्ञानानन्द सरस्वती, योगानन्द, सरस्वती, कृष्णानन्द सरस्वती इत्यादि यहीं निवास करते थे। स्वामीजी द्वारा शुरू किय गये अन्नक्षेत्र में प्रतिदिन दोपहर 11 से 12 बजे तक दण्डी स्वामियों के लिये भिक्षा होती थी। यह अन्नक्षेत्र मार्गशीर्ष कृष्णा 1 वि. सं. 1998 (4.11.41) तक निबार्ध रूप से चलता रहा किन्तु बाद में व्यवधान आ गया था। स्वामी ब्रह्मनारायण ने इसे पुनः व्यवस्थित रूप से शुरू करने व नये आर्थिक प्रबंध हेतु अथक प्रयास किये। फलस्वरूप अहमदाबाद के सेठ रमणलाल ललूभाई के सहयोग से आषाढ़ शुक्ला 15 वि. सं. 1999 (27 जुलाई 1942 ई.) से इस मठ में पुनः नियमित रूप से अन्नक्षेत्र शुरू हो गया। स्वामीजी ने यह अनुभव करते हुये कि पुष्कर जैसे तीर्थस्थल पर दण्डी स्वामीयों के लिये भिक्षा का कोई उचित प्रबंध नहीं है, जबकि पुष्कर में अन्नदान का बड़ा भारी महत्व है, अपने मठ में इस अन्नक्षेत्र को नियमित रखने हेतु स्थायी प्रबंध किया था। स्वामीजी ने अजमेर निवासी पं. विष्णुप्रसाद गिरधारीलाल शर्मा को अन्नक्षेत्र का प्रबंधकर्ता बनाया था। अन्नक्षेत्र में अन्नदान चालू रखने हेतु एक रूपया प्रतिदिन (जिससे 4 – 5 सन्यासियों की भिक्षा की व्यवस्था हो सके) के हिसाब से रू. 365/- वार्षिक व्यय आंका गया था और इसके लिये स्वामीजी ने सनातनी गृहस्थों से सहायतार्थ अपील प्रसारित की थी। इसके प्रत्युत्तर में स्वामीजी को उत्साहवर्धक आर्थिक सहयोग प्राप्त हुआ था।

परन्तु दुर्भाग्य से अन्नक्षेत्र को पूरे उत्साह से स्थायित्व प्रदान करने के एक माह बाद ही साठ वर्ष की आयु में भाद्रपद कृष्णा 4 वि. सं. 1999 को स्वामी ब्रह्मनारायण का स्वर्गवास हो गया। उनकी इच्छानुसार उनके शिष्यों ने मठ के बाहर बनाए गये समाधिस्थल में उनको समाधिस्थ कर दिया। वि. सं. 1965 में पं. ब्रह्मनारायण ने श्री फूलनारायण आश्रम सोजत में भुडायत माता के मंदिर के सामने भी अपने लिये समाधिस्थल का निर्माण करवाया था और अपने शिष्यों को निर्देश दिया था कि इस खाली समाधि को उनके अलावा कोई काम ने लेने पावे। यदि उनकी (श्री ब्रह्मनारायण) मृत्यु सोजत के बाहर कहीं देशाटन में हो जाये तो इस समाधि पर महादेव की चरणपादुका स्थापित कर इस स्थल को उनकी छतरी का रूप दे दिया जावे।

मठ की प्रबंध व्यवस्था

श्री ब्रह्मनारायण आश्रम की स्थापना का मुख्य उद्देश्य स्वयं पं. ब्रह्मनारायण के शब्दों में जो कि आश्रम के मुख्य द्वार पर लगे शिलालेख में अंकित है, निम्नलिखित है – ‘इसमें दण्डी स्वामी तथा श्रीमाली ब्राह्मण विश्राम कर सकेंगे।’ इस पंक्ति का आशय अपने आप में बहुत ही स्पष्ट है अर्थात दण्डी स्वामी तथा प्रत्येक श्रीमाली ब्राह्मण को इस तीर्थस्थल की यात्रा में आने पर इस आश्रम में अस्थायी रूप से ठहरने अर्थात विश्राम करने की सुविधा दी गई है। इसी कारण इसका नाम मठ न करके ब्रह्मनारायण आश्रम रखा गया।

स्वामी जी ने अपने जीवनकाल में अपनी व्यक्तिगत प्रभाव का उपयोग करते हुये विशाल संपत्ति खड़ी कर दी थी। सोजत में श्री फूलनारायण आश्रम एवं सुरेश्वर महादेव का जीर्णोद्धार तथा ज्ञानानन्दजी की बगीची का नवनिर्माण करके तत्संबंधी वैधानिक दस्तावेजों को जोधपुर गवर्नमेंट में रजिस्टर्ड करवा दिया था। जिसका प्रामाणिक उल्लेख यथास्थान कर दिया गया है। बाद में जोधपुर एवं पुष्कर में स्थापित मठों का नामकरण अपने नाम पर करते हुए तत्संबंधी वैधानिक दस्तावेजों को क्रमशः जोधपुर एवं अजमेर गवर्नमेंट में रजिस्ट्री करवा दिया था। इस प्रकार उत्तराधिकार में प्राप्त सम्पत्ति का जो उन्होंने विस्तार किया वह उनके निजी प्रभाव का परिणाम था। दानदाताओं ने उनके नाम से सम्पत्ति भेंट करते हुए कानूनी दस्तावेज तैयार करवाए थे। इन दानदाताओं में श्रीमाली ब्राह्मणों का ही बाहुल्य था। यही कारण है कि नवीन मठों (जोधपुर एवं पुष्कर) की स्थापना उनके नाम पर (श्री ब्रह्मनारायण आश्रम) की गई थी। अपने जीवन के अन्तिम वर्षो में तीर्थस्थल पुष्कर में अन्नदान के महत्त्व से प्रेरित होकर स्वामीजी ने अपने मठ में अन्नक्षेत्र शुरू करने एवं उसे नियमित करने के कार्य को सर्वोच्च प्राथमिकता प्रदान की थी। इसी कारण पुष्कर स्थित आश्रम को उन्होंने अपना स्थायी आवास बना दिया था, तथा अन्तिम वर्षो में विभिन्न स्थानों में फैले अपने विभिन्न कार्यों का संचालन पुष्कर से ही (शिष्यों के आवागमन एवं पत्रव्यवहार द्वारा) करते थे। इन दिनों उन्होंने अन्नक्षेत्र के लिए दानदाताओं से सहायतार्थ राशि भिजवाने हेतु जो विज्ञप्तियाँ प्रसारित की थी उनमे उनका स्थायी पता ‘श्री ब्रह्मनारायण आश्रम, बड़ी बस्ती, पुष्कर’ अंकित रहता था।

पुष्कर में निवास करते हुए श्री ब्रह्मनारायण को जब अपने अन्तिम समय की अनुभूति हुई तब उनकी चिन्ता का प्रमुख विषय उनके मृत्युपरान्त श्री ब्रह्मनारायण आश्रम पुष्कर की व्यवस्था एवं मिल्कियत का था। इसका प्रमुख कारण उनके विशाल शिष्यवर्ग में से उनके उत्तराधिकार (आपसी वैमनस्य के कारण) को लेकर संशय का था। खोंड निवासी उनके प्रमुख कृपापात्र सेवक पं. गौरीशंकर बोहरा के विवरण से पता चलता है कि वि.सं. 1986 में कार्तिक पूर्णिमा के पश्चात् ब्रह्मनारायण पुष्कर से देशाटन के लिए रवाना हुए थे। स्वामीजी कलकत्ता, प्रयाग एवं कुम्भ की यात्रा करते हुए वि.सं. 1987 के कार्तिक मास में हैदराबाद पहुंचे थे जहाँ उनका भारी स्वागत-सत्कार हुआ था। यहाँ उन्होंने श्रीमाल माहात्म्य एवं गीता का प्रवचन किया था। वहाँ से मद्रास सेतुबन्ध रामेश्वर होते हुए पुनः हैदराबाद आते हुए नागपुर गए थे। नागपुर में फाल्गुन शुक्ला 5 रविवार वि.सं. 1987 को कण्टालिया (सोजत) निवासी श्रीमाली ब्राह्मण ओझा गोपीनाथ को संन्यास दीक्षा प्रदान कर अपना शिष्य बनाया और उनका नाम आत्मानन्द सरस्वती रखा। वहाँ से वे आत्मानन्दजी के साथ सोजत होते हुए जोधपुर पहुंचे थे।

ऐसा प्रतीत होता है कि पुष्कर में रहते हुए अन्तिम वर्षो में जब उनके शिष्यवर्ग में स्वामी कृष्णानन्द सरस्वती उनके उत्तराधिकारी के रूप में प्रभावशाली रूप से उभर रहे थे तब स्वामी ब्रह्मनारायण की इच्छा स्वामी आत्मानन्द सरस्वती को अपना उत्तराधिकारी बनाने की थी क्योंकि श्री फूलनारायण आश्रम की परम्परानुसार श्रीमाली ब्राह्मण होने के नाते पं. आत्मानन्द ही उनके गादीधारी हो सकते थे किन्तु दण्डी स्वामियों की सरस्वती परम्परा में ऐसा जातीय आधार उत्तराधिकार हेतु निश्चित नहीं किया जा सकता था। अतः उनका शिष्यवर्ग स्वामी कृष्णानन्द सरस्वती (जो श्रीमाली ब्राह्मण नहीं थे) के पक्ष में प्रबल था। इन परिस्थितियों में स्वामीजी ने श्री ब्रह्मनारायण आश्रम पुष्कर की मिल्कियत एवं व्यवस्था के सम्बन्ध में एक लम्बी वसीयत लिखी जो उनके समाधिस्थ होने (भाद्रपद कृष्णा 4 वि.सं. 1999) के कुछ ही समय पूर्व की है। इस वसीयतनामे (जिसकी मूल प्रति संस्था के कार्यालय में उपलब्ध है) के कुछ महत्त्वपूर्ण अंश स्वामीजी के शब्दों में इस प्रकार है-

साधु व संन्यासी व महन्त व दानी सज्जन आश्रम मठ-मंदिर और धर्मस्थान उपदेश देकर स्थापित करते हैं किन्तु उचित प्रबन्ध न होने के कारण उन धर्मात्माओं के स्वर्गवास होने के पश्चात् उनके स्थापित किए हुए धर्म संस्थान, आश्रम, मठ मंदिरों की दशा खराब हो जाती है। शिष्य व पुजारी आदि व्यय का कुछ प्रबन्ध न होने के कारण बेच देते है, ऐसी स्थितियों को देखकर मुझे दण्डी स्वामी ब्रह्मनारायणनन्द सरस्वती को अपने आश्रम, मठ, दण्डी संन्यास आश्रम वगैरह धर्मसंस्थानों का उचित प्रबन्ध करना अत्यावश्यक समझ पड़ा और पूरा ख्याल होने लगा कि हमारी वृ़द्धावस्था होने पर आई है, यह इच्छा प्रकट करता हूं कि दण्डी स्वामी श्री ब्रह्मनारायण आश्रम मठ, बड़ी बस्ती थल्ला पर स्थापित किया है जिसकी मकानों की जमीन खरीदकर मकानों की रजिस्ट्री अजमेर में गवर्नमेंट सरकार में कराई है जिसकी नकलें सब रजिस्टर में दर्ज करी हुई है मय नक्शा, सो जरूरत पड़ने पर काम आएगी शर्त यह है कि आश्रम मठ को कोई भी शिष्य प्रशिष्य आल औलाद श्रीमाली ब्राह्मण न्यात के पंच व ट्रस्टी कोई भी बेचान रहन गिरवे या बक्षिस दान करने का किसी को भी अधिकार नहीं होवेगा। द.दण्डी स्वामी ब्रह्मनारायणनन्द। इसी वसीयत में लिखा है कि ‘समस्त दाता व धर्मशील महानुभावों की सेवा में सादर आवेदन, जिन धर्म संस्थाओं से प्राणी मात्र का हित होता था अब उनकी सार संभाल नहीं होने से मंदिर मठ धर्मशाला आदि में अच्छे सुपात्रों का तो प्रवेश ही नहीं होता ; किन्तु धूर्त पाखंडी लोग वहाँ घुसकर उस धर्म के पेशे को निज आराम में लगाकर अर्थ का अनर्थ कर रहे हैं। जनता को चाहिए कि सम्पत्ति का सदुपयोग करने को दूने चैगुने, परमार्थ के काम करे करावें पर उनकी देखरेख का भार पांच भद्र पुरूषों को अवश्य दे जावे जिससे कि वह काम सदा चलता रहे।’

आश्रम के प्रवेशद्वार के मूल शिलालेख तथा वसीयतनामे से स्पष्ट है कि पं. ब्रह्मनारायण अपने आश्रम के स्वामित्व का न तो हस्तान्तरण करना चाहते थे और न ही उन्होंने किया, बल्कि इसकी व्यवस्था में उन्होंने अपने शिष्यवर्ग एवं श्रीमाली ब्राह्मण समाज (न्यात) को बराबर महत्त्व प्रदान किया। जब स्वामीजी अपने जीवनकाल में अपने उत्तराधिकारी की सार्वजनिक घोषणा नहीं कर सके तो उनके देहावसान के तुरन्त पश्चात् आत्मानन्द एवं कृष्णानन्द के समर्थकों में उत्तराधिकारी के प्रश्न पर मनोमालिन्य हो गया। यद्यपि वि.सं. 2000 में पं. कृष्णानन्दजी ने अपने शिष्यवर्ग के प्रबल समर्थन के आधार पर अपने को पं. ब्रह्मनारायणजी का उत्तराधिकारी एवं श्री फूलनारायण आश्रम सोजत का गादीधारी घोषित कर दिया ; किन्तु सोजत के श्रीमाली ब्राह्मण समाज ने निर्विवाद रूप से इसे मान्यता प्रदान नहीं की। इसी कारण श्री फूलनारायण आश्रम सोजत में परम्परानुसार गादीधारी होने का आयोजन, जिसके लिए दण्डी स्वामी का श्रीमाली ब्राह्मण होना एवं स्थानीय न्यात की सर्वानुमति होना आवश्यक था, विधिवत् सम्पन्न नहीं हो सका और विवाद की यह स्थिति कई वर्षो तक रही। फलस्वरूप पं. फूलनारायण की शिष्य परम्परा पं. ब्रह्मनारायण स्वामी के साथ औपचारिक रूप से समाप्त हो गई यद्यपि अनौपचारिक रूप से पहले कृष्णानन्दजी एवं बाद में पं. आत्मानन्दजी अपने उत्तराधिकार दावे के साथ कुछ वर्षो तक श्री फूलनारायण आश्रम सोजत में निवास करते रहे थे।

इस प्रकार जब पं. ब्रह्मनारायणजी का कोई शिष्य ही नहीं रहा तो उनकी स्वयं की हस्तलिखित वसीयत के अनुसार उनके आश्रम की व्यवस्था का एक मात्र अधिकार समस्त श्रीमाली ब्राह्मण समाज को ही रहा । अतः श्रीमाली ब्राह्मण महालक्ष्मी ट्रस्ट, सोजत की सहमति से पुष्कर स्थित अखिल भारतवर्षीय श्रीमाली ब्राह्मण समाज ने इस आश्रम की व्यवस्था एवं संचालन अपने हाथ में ले लिया जो स्वामीजी की वसीयत के अनुसार आज भी बदस्तूर जारी है।


 

महेषानन्द जी

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रसानन्द जी

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